फरवरी 2016

संधारणीयता: नवप्रवर्तन के लिए नूतन अवसर

बहुधा हमारी जीवनशैलियां उन तकनीकी तरक्कियों द्वारा निर्धारित होती हैं, जिनका उद्देश्य मानव स्वास्थ्य और आरामदेहिता में और सुधार लाना होता है। लेकिन, तकनीकी द्वारा प्रेरित तेज औद्योगीकरण और परिणामस्वरूप उपोक्तावाद में वृद्धि होना, आज की जलवायु परिवर्तन समस्या का हिस्सा है। डॉ. गोपीचंद कटरागड़ा, यहां विडंबना एवं संभावनाओं के बारे में विचार व्यक्त करते हैं

2015 के आखरी कुछ सप्ताह, जलवायु परिवर्तन का अनुभव कराने वाले बीते। नवम्बर 19 और 20 के दौरान चेन्नई में हमारा ग्रूप सीटीओ फोरम आयोजित किया गया था। वैसे तो उन दो दिनों के लिए वर्षा रानी ने हमें परेशान नहीं किया, लेकिन उससे पहले और बाद में, कुछ दिनों के लिए चेन्नई में मुशलाधार बारिश के चलते पूर की स्थिति बन गई थी। उसके बाद, नवम्बर 25 और 26 को, बीजिंग में चीन के निगमों की मुलाकात के लिए टाटा सन्स की जो टीम गई थी, उसमें एक मैं भी था। बीजिंग में 26 नवम्बर का दिन, पूरे एक सप्ताह के बाद ऐसा दिन रहा जब वहां आसमान साफ दिखा। बाकी सप्ताह भर से शहर में इतनी धुंध थी कि चेतावनियां जारी की गई थीं। लेकिन दिल्ली में, 9 दिसम्बर के दिन जब मैं सीआइआइ की एक बैठक में हिस्सा लेने गया, तब मुझे सौभाग्य का ऐसा साथ नहीं मिला। वहां धुंध ने पुरजोश में अपना साम्राज्य फैला रखा था। इन सारी बातों को पश्र्चाद् भू में रख कर और पेरिस में जलवायु के बारे में जो चर्चाएं हुईं, उन सब बातों को ध्यान में लेते हुए मैं नवदर्शनम् की कहानी साझा करता हूं।

नवदर्शनम्, बैंगलूरू से लगभग 40 किमी की दूरी पर स्थित, 100 एकड़ का ज़मीन का एक हिस्सा है, जो विश्व को एक नयी द्दष्टि देने का उद्देश्य लिये हुए है। ट्रस्ट के स्थापक सदस्यों में से एक, अनंतु और ज्योति, पति और पत्नी - भी थे जो कई वर्षों तक नवदर्शनम् में रहे। अनंतु, स्टैनफॉर्ड से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक हैं। उन्होंने कॉर्पोरेट दुनिया छोड़ी और पिछले 20 वर्षों से स्वयं को एक ऐसे पर्यावरण का निर्माण करने के लिए समर्पित किया है जहां पृथ्वी को एक सजीव अस्तित्व माना जाता है, वो अस्तित्व जिसे कम से कम हस्तक्षेप के साथ, अगर अपनी खुद की रचना पर छोड़ दिया जाए तो वो खुद को पोषित कर सकता है और स्वयं को स्वस्थ भी कर सकता है।

सौ-एकड़ की जमीन पर अत्यधिक चराई न होने दे कर, अनंतु और मित्रों, जिनमें से अधिकांश गांधी पीस फाउन्डेशन के सदस्य हैं, आसपास की वीरानियों के बीच भी हरियाली से हराभरा जंगल फिर से उगाने में सफल रहे हैं। इस जंगल में अब 200,000 वृक्ष और पौधे लहलहा रहे हैं, इनमें से कुछ चंदन के वृक्ष हैं और कुछ सागौन के वृक्ष भी। कुछ पंछियों, सांप, प्राणियों एवं जीवजंतुओं ने भी इसे अपना बसेरा बनाया हुआ है। हाथियों एवं तेंदुओं को रोकने के लिए यहां एक बिजली की एक बाड़ भी है, जिससे हल्का सा झटका लगता है। अलबत्ता, कभीकभार तेंदुए इसमें से भी प्रवेश कर जाते हैं और एक हिरन या कुत्ते से काम चला लेते हैं। हाथियों ने भी बिजली की इस बाड़ को शॉर्ट-सर्किट करने के गुर येनकेन जान लिये हैं और लहलहा रही फसल पर आ धमकते हैं। आप जब नवदर्शनम् में रात्रि निवास करें तब संभव है कि आपको पास वाले गांववासियों के ढोल-नगाड़े बजाने की आवाज़ सुनने मिल जाये, जो ये लोग हाथियों को इस तरह डरा कर जंगल में वापस भेजने के लिए बजाते हैं। या यह भी हो सकता है कि रात में जग जाने पर आप देखें कि पास से ही सांप सरक गया।

प्रौद्योगिकी के अजूबे
इन सब द्दश्यों के बावजूद, नवदर्शनम् में प्रौद्योगिकी यहां वहां बिखरी पड़ी है। यहां ग्रिड से बिजली नहीं प्राप्त की जाती, बैटरी-चलित सौर फोटोवॉल्टेक सेल हैं जो बिजली की आपूर्ति करते हैं। बैटरी-चलित ही एक छोटी पवनचक्की भी है, 400 वॉट की सर्वाधिक क्षमता वाली यह पवनचक्की एक डीज़ल इंजन से चलती है और इसका इंधन है होंज1 तेल, गोबर 2- रसोई गैस के लिए गैस सुविधा, और एक विद्यार्थी द्वारा रचयित ओवन, अवांछित वस्तुओं से काठकोयला बनाने वाला। यहां के घर मिट्टी के ब्लॉक से बनाये गये हैं, इनमें लगभग 3 प्रतिशत सीमेंट मिलाई गयी है। इनकी रचना इस प्रकार की गई है कि कुदरती प्रकाश का अधिकतम इस्तेमाल किया जा सके, बोज उठाने के लिए कंक्रीट बीम के बजाए कमानों का इस्तेमाल किया गया है और घरों को हवादार बनाया गया है, ताकि पंखों की ज़रूरत, गरमी के दिनों में भी न पड़े। नवदर्शनम् जो कुछ प्रौद्योगिकी चुनौतियों का सामना कर रहा है उनमें, होन्ज तेल की अधिक चिपचिपाहट, उनके सौर पैनलों की क्षमता कम हो जाना, प्रांत में कम मात्रा में पवन का होना और मिट्टी के ब्लॉक बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली मिट्टी की गुणवत्ता जांचने की तकनीक - शामिल हैं।

नयी सदी में हमें अपनेआप को शायद गांधी के शब्द याद करवाने की आवश्यकता है, उन्होंने कहा था, “पृथ्वी प्रत्येक व्यक्ति की ज़रूरत जितना तो देती है, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति की लालच जितना नहीं।”  चूंकि हम पानी और बिजली की तीव्र कमी की ओर आगे बढ़ते जा रहे हैं, मूलभूत रूप से जीवन जीने का तरीका शायद ज़्यादा ही मन को स्पर्श करे। या, शायद, जैसे कि एक और अक्लमन्द इन्सान ने कहा था, जब शक हो, मध्य राह का अनुसरण करें।

विकास के बारे में फिर से सोचना
यह बहस हमेशा से रही है, क्योंकि इन्सान अपने आसपास के वातावरण को खोजने तथा अपने फायदे के लिए सब कुछ पा लेने के उद्देश्य से प्रयत्नशील रहता है। किंतु, एक पीढ़ी के लिए जो फायदेमंद है, वो भावि पीढ़ियों के लिए खजाना खाली कर देने वाली बात हो सकती है और विशेष कर के परिस्थितितंत्र के विषय में, यह बात तो हर कोई स्वीकार करता है कि ये दोनों ही एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इस कारण से भी कि, व्यावहारू द्दष्टि से, विकास एकदिशा वाला होता है और बीते कल की लालच, आज की ज़रूरत है। मोटर गाड़ियों के युग से, बिना प्रौद्योगिकी वाले जीवन में स्वेच्छा से पीछे लौटने की बात नहीं है।

जेम्ल वॉट शायद इस तीव्र इच्छा से प्रेरित थे कि भाप की ताक़त समझना और मानवता के महत्तम फायदे के लिए इसका इस्तेमाल करना। उन्होंने शायद ही सोचा होगा कि उनकी खोज के साये में औद्योगिक क्रान्ति पनपेगी और नतीजा होगा जलवायु परिवर्तन, जिसमें कुछ प्रजातियां तो नामशेष हो ही चुकी हैं, अब खुद मानव जीवन भी खतरे में है। बावजूद इसके, नवप्रवर्तन के लिए अब और भी अवसर आ खड़े हैं, क्योंकि वर्तमान प्रौद्योगिकियों को उन प्रौद्योगिकियों से पूर्णतया बदल देना होगा जो कि प्रकृति से केवल उतना ही लेती है जितना एक जीवनकाल में उसे वापस लौटा सके। किंतु प्रौद्योगिकी ग़ैरज़िम्मेदाराना उपभोक्तावाद का हरजाना नहीं भर सकती। पेरिस में मिलने वाली सभी हस्तियों को हल खोज निकालना होगा कि कैसे नौकरियों के अवसरों का सृजन किया जाए, अरबों लोगों की अन्न व्यवस्था की जाए, और तथापि उपभोग कम किया जाए।

1 अखाद्य तेल का उत्पादन करने वाले एक स्थानीय वृक्ष का बीज

2. गोबर